अहंकार का फल | Stories In Hindi With Moral

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अहंकार का फल

Stories in hindi with moral:सतयुग में सुप्रतीक नाम का एक राजा रहा करते थे. वो बहुत ही पराक्रमी थे. उनकी पत्नी का नाम जानकी था. उन्हें कोई संतान नहीं थी मगर दुर्वासा ऋषि के आशीर्वाद से उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति हुई. उन्होंने उसका नाम दुर्जय रखा. राजकुमार दुर्जय धीरे धीरे बड़ा होने लगा. वो बहुत ही बलि था और साथ ही शस्त्र-संचालन में भी उसने जल्द ही निपुणता हासिल कर ली. अपने पुत्र की योग्यता देख राजा ने उसे अपने राज्य का भर सौंप दिया और स्वयं अपनी पत्नी के साथ चित्रकूट पर्वत पर तपस्या के लिए निकल पड़ा.

राजा बनते ही दुर्जय ने अपने राज्य के सीमाओं का बढ़ाना शुरू कर दिया. उसने पड़ोसी राज्यों में आक्रमण करना शुरू का दिया. और सारे आसपास के राज्यों को अपने में मिला लिया. धीरे धीरे वह विशाल राज्य का सम्राट बन गया. इसी कारण वश उसके अंदर धीरे धीरे अहंकार घर करने लगा.

एक दिन दुर्जय अपने सैनिकों के साथ जंगल में शिकार करने गया. वहाँ उसने एक सुन्दर सा सरोवर देखा. सम्राट दुर्जय को वो स्थान बहुत प्रिय लगा. उस सरोवर के पास एक कुटिया थी जिसमे गौमुख नामक एक ऋषि रहते थे. सम्राट दीर्जय और उनके सैनिकों को देख ऋषि गौमुख ने उनका खूब सत्कार किया. दुर्जय ने ऋषि से वहाँ रात्रि बिताने की इच्छा व्यक्त की. ऋषि इससे प्रसन्न तो बहुत हुए लेकिन उन्हें चिंता भी हुई. इस चिंता का कारण था की राजा और उनके सैनिकों को ठहराने का उनके पास कोई उपयुक्त व्यवस्था नहीं थी. इसके अलावा उनके पास पर्याप्त भोजन भी नहीं था और  न भोजन सामग्री.

ऋषि गौमुख इसी चिंता में परेशां थे, और अंत में भगवन नारायण का ध्यान किया. अपने भक्त की पुकार सुन प्रभु वहाँ आये. जब उन्होंने अपनी समस्या बताई तो भगवन ने उन्हें चिंतामणि देते हुए कहा की इसे अपने पास रखिये. आपको जिस किसी की भी आवश्यकता होगी ये चिंतामणि उसी हिसाब से पूरा करेगा. ऋषि ने उस चिंतामणि को लेकर सबसे पहले एक भव्य महल करने का स्मरण किया. शीघ्र ही वहाँ एक शानदार महल बन गया. ऋषि ने दुर्जय से कहा की आप अपने सैनिकों के साथ महल के अंदर जाकर विश्राम कर सकते है. उसके बाद ऋषि ने भोजन की इच्छा की. तुरंत ही महल के अंदर तरह तरह के पकवान आ गए. राजा और उनके सैनिकों के आश्चर्य का ठिकाना न था. क्योंकि न तो इससे पहले उन्होंने ऐसा सुन्दर महल देखा था न ऐसा स्वादिष्ट भोजन खाया था.

रात्रि बिश्राम के बाद जब दुर्जय और उसके सैनिक वापस जाने लगे तो महल स्वतः ही गायब हो गया. ये देख सभी आश्चर्य में पद गए. दुर्जय ने जिज्ञासावश ऋषि से पूछा की ऋषिवर आप इतने काम समय में इतनी अच्छी व्यवस्था कैसे कर ली. क्या आपके पास कोई चमत्कारी चीज है.

हाँ, ये सब इस चिंतामणि का कमाल है. जो मुझे भगवान से मिला है. इससे जो कामना की जाये वो पूर्ण हो जाती है.

क्या, यह चिंतामणि आप मुझे दे सकते है. सम्राट दुर्जय ने ऋषि से पूछा ?

ऋषि ने चिंतामणि देने से इंकार कर दिया . इस पर दुर्जय को क्रोध आ गया. वो हर परिस्थिति में वो चिंतामणि पाना चाहता था. अहंकारी तो वो था ही. उसने ऋषि कको धमकी दी की तुम मेरी शक्ति नहीं जानते. या तो मुझे चिंतामणि दे दो या प्राण त्यागने के लिए सज्ज हो जाओ. इतना कहना ही था की तभी की तभी एक चमत्कार हुआ. चिंतामणि से असंख्य योद्धा निकल आये. वे ऋषि की और से राजा व उनके सैनिकों पर टुट पड़े. ऋषि व्याकुल हो प्रभु से प्रार्थना की हे प्रभु इन दुष्टों का विनाश करो. तभी भगवन नारायण वहां आ गए और क्षण भर में ही सम्राट दुर्जय और उनके सैनिकों का सर्वनाश कर दिया. इस तरह दुर्जय को अपने अहंकार का फल चुकाना पड़ा.

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