झंडे का रंग | Stories in Hindi With Moral

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झंडे का रंग

Stories in hindi with moral:उसने गुरु के आश्रम में रहकर कई वर्ष तक शिक्षा प्राप्त की. शिक्षा पूरी होने के बाद वह गुरु से गुरु दक्षिणा लेने की अनुग्रह करने लगा. लेकिन गुरु ने कहा की मुझे गुरु दक्षिणा की कोई आवश्यकता नहीं है. तुम सदा ऐसे कार्य करना जिससे सदा मानव जाति का कल्याण हो. इस बात पर शिष्य ने गुरु को वचन दिया की ऐसा ही होगा. किन्तु गुरु दक्षिणा तो कुछ न कुछ स्वीकारना होगा.

शिष्य के इस हठ को देखकर गुरु ने उसे काले रंग का झंडा दिया. कहा की इस झंडे को सारे तीर्थस्थलों में ले जाना। इसे पवित्र नदियों के जल से धोना।  जब इसका रंग सफ़ेद हो जाये तो समझाना मुझे गुरु दक्षिणा मिल गयी.

शिष्य ने गुरु की बात मानकर उस झंडे को लेकर निकल पड़ा. उसने देश के हर पवित्र स्थानों पर भ्रमण किया और वहाँ के जल से उस झंडे को धोया. लेकिन झड़े के रंग में को परिवर्तन नहीं आया. इस तरह धीरे धीरे ५ वर्ष बिट गए. कभी कभार वह हताश हो जाता और सोचता की क्या ये झंडा सफ़ेद हो पायेगा.

एक दिन वह एक तीर्थ स्थान से लौटकर एक जंगल से गुजर रहा था. अँधेरा हो आया इसीलिए जंगली पशुओं के डर से वह एक वृक्ष के ऊपर चढ़ गया. लेकिन उसे नींद नहीं आई. अंतिम प्रहार में उसे कुछ घोड़ों के टापू की आवाज़ सुनाई दी. तीन घुड़सवार उसी वृक्ष के निचे आकर रुक गए. उन्होंने एक सुन्दर युवती को बंदी बनाकर रखा था. उसके हाथ पाँव बंधे हुए थे. घोड़े से उतारकर उन्होंने उस युवती को वृक्ष के निचे लिटा दिया. उसके बाद एक ने बाकी दो को पानी की खोज में भेज दिया. शायद निर्देश देने वाला उनका सरदार होगा. और स्वयं वृक्ष के निचे विश्राम करने के लिए लेट गया.

वृक्ष के ऊपर बैठा शिष्य सबकुछ देख रहा था. उसे समझने में देर नहीं लगी की ये लोग डाकू है और इस युवती का अपहरण किया है. उस युवती को देख दया आ गयी. थोड़ी देर बाद जब डाकू का सरदार सो गया तो शिष्य निचे उतरा और उसे ललकारा.

डाकू जब तक संभलकर तलवार उठता तब तक शिष्य ने तलवार उठाकर उसे मौत के घाट उतार दिया. इसके बाद उसने दोनों घोड़ों को चाबुक से मारकर भगा दिया ताकि अन्य दो डाकू उसका पीछा न कर पाए. उसने युवती के हाथ पेअर खोले. पता चला की वो पास के गाँव के साहूकार की बेटी है और ये लोग उसे उसकी शादी से ही उठाकर ले आये. उसने उस युवती को वापस उसके घर लेकर छोड़ दिया. तब तक वहाँ सब शोक में दुबे थे. जब युवती ने पूरी घटना अपने परिवार वालों को सुनाई तो उसके पिता ने उसे गले लगा लिया और उसका खूब स्वागत-सत्कार किया.

उजड़े मंडप को फिर से सजाया गया और विवाह भी पूरी तरह से संपन्न हुआ. शिष्य फिर से अपनी यात्रा पर निकल पड़ा.

गाँव के बहार आते आते सुबह हो चूका था. अचानक हवा में फड़फड़ाते झंडे को देखा तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा. झंडा श्वेत रंग में सूरज की किरण से चमचमा रहा था. इसे देख उसकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा. उसने श्रद्धापूर्वक अपने गुरु को स्मरण किया मन ही मन धन्यवाद देते हुए कहा की ज्ञान के साथ निस्वार्थ सेवा का पाठ पढ़ाकर आपने मेरी शिक्षा पूर्ण कर दी.

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